Indian History
भारतीय इतिहास
प्राचीन भारत
इतिहास अतीत को जानने का एक साधन है |
किसी समाज या राष्ट्र के इतिहास के अध्ययन के द्वारा हम उस समाज या राष्ट्र के अतीत , संस्कृति और सभ्यता के बारे में जान सकते हैं | भारत में मानवीय कार्यकलाप के जो प्राचीनतम चिह्न अब
तक मिले हैं, वे 4,00,000 ई. पू. और 2,00,000 ई. पू. के बीच दूसरे और तीसरे हिम-युगों के संधिकाल के हैं और वे इस बात
के साक्ष्य प्रस्तुत करते हैं कि उस समय पत्थर के उपकरण काम में लाए जाते थे।
जीवित व्यक्ति के अपरिवर्तित जैविक गुणसूत्रों के प्रमाणों के आधार पर भारत में
मानव का सबसे पहला प्रमाण केरल से मिला है जो सत्तर हज़ार साल पुराना
होने की संभावना है। इस व्यक्ति के गुणसूत्र
अफ़्रीक़ा के प्राचीन मानव के जैविक गुणसूत्रों (जीन्स) से पूरी तरह मिलते हैं। इसके पश्चात् एक लम्बे अरसे तक विकास मन्द गति से होता
रहा, जिसमें अन्तिम समय में जाकर तीव्रता आई और उसकी परिणति 2300
ई. पू. के लगभग सिन्धु घाटी की आलीशान सभ्यता (अथवा नवीनतम नामकरण के अनुसार हड़प्पा
संस्कृति) के रूप में हुई। हड्ड्प्पा की पूर्ववर्ती संस्कृतियाँ
हैं: बलूचिस्तानी पहाड़ियों के गाँवों की कल्ला
संस्कृति और राजस्थान तथापंजाब की नदियों के किनारे बसे कुछ
ग्राम-समुदायों की संस्कृति। यह काल वह है जब
अफ़्रीक़ा से आदि मानव ने विश्व के अनेक हिस्सों में बसना प्रारम्भ किया जो पचास
से सत्तर हज़ार साल पहले का माना जाता है।
एतिहासिक स्रोत
भारत का नामकरण
हमारे देश के लिए प्राय: इण्डिया अथवा भारत जैसे नमो का प्रयोग करते है |
इंडिया शब्द इंडस से निकला है, जिसे संस्कृत में सिन्धु कहा जाता हैं| भारतवर्ष नाम पाणिनि की अष्टाध्यायी में आया | अन्य नाम आर्यावर्त , जम्बूद्वीप का भाग |
इतिहासकार प्राचीन भारत को जानने के तिन भागो में बांटते है :-
1. प्रागैतिहासिक काल ( मानव उत्पति से 3000 ई. पू. )
2. आध्य एतिहासिक काल ( 3000 ई. पू. से 600 ई. पू. )
3. एतिहासिक काल ( 600 ई. पू. से आगे )
प्राचीन भारत का वह काल जब मनुष्य पूर्णत सभ्य नही था, उस काल का कोई लिखित स्रोत उपलब्ध नही है वह काल प्रागेतिहसिक काल कहलाता हैं |
इस काल का इतिहास लिखने के लिए इतिहासकारो को पूर्णत: पुरातात्विक साधनों पर निर्भर रहना पड़ा,अब एक ऐसा काल आता है जब मनुष्य लिखना जनता था , लेकिन अब उसे पढ़ा नही जा सकता है वह काल था आध्य एतिहासिक काल ( 3000 ई. पू. से 600 ई. पू. ) |
इस काल का इतिहास लिखने के लिए इतिहासकरो ने साहित्यिक और पुरातात्विक साक्ष्यो के और विदेशियों के विवरण का सहारा लिया गया लगभग 600 ई. पू. के बाद का काल प्रागेतिहसिक काल कहलाया |
प्राचीन भारतीय इतिहास को जानने के लिए तिन शीर्षको में रखा गया हैं :-
1. पुरातात्विक स्रोत
2. साहित्यक स्रोत
3. विदेशी विवरण
1. पुरातात्विक स्रोत
अभिलेख मुहरो, स्तूपों ,प्रस्तर स्तम्भों, चट्टानों, ताम्रपत्रों, मूर्तियों, मंदिर की दीवारों और इंटों पर प्राप्त होता हैं |
अभिलेखों की भाषा प्राकृत , पाली , संस्कृत तथा अन्य दक्षिण भाषाएँ हैं | कुछ द्विभाषी तथा विदेशी भाषा में भी उत्कीर्ण हैं , इनके अध्धयन को पुरालेखशास्त्र कहा जाता है , पुराने दस्तावेजो की तिथि के अध्ययन को पूरालिपिशास्त्र कहा जाता हैं |
हड़प्पा सभ्यता की मुहरो पर लगभग 2500 ई. पू. के सबसे पुराने अभिलेख प्राप्त हुए , लेकिन इनको अभी तक पढ़ा नही गया है | सर्वप्रथम 1837 ई. जेम्स प्रिन्सेप को अशोक के अभिलेख को पढ़ने में सफलता मिली |
भारत से बहार पश्चिम एशिया के बोगजकोई नामक स्थान से अभिलेख मिले, जिसमे इन्द्र, मित्र , वरुण और नास्तय आदि वैदिक देवताओ के नाम मिलते हैं | ईरान से प्राप्त नक्स-ए-रुस्तम अभिलेख भारत ईरान के सम्बन्धो की जानकारी मिलती हैं, तथा कस्साइट अभिलेख तथा सीरिया से प्राप्त मित्तनि अभिलेख में आर्य नाम उल्लेख मिलता हैं |
अन्य प्रमुख अभिलेख :- अशोक का अभिलेख, खारवेल का हाथीगुम्फा अभिलेख, शकक्षत्रप रुद्रदामन का जूनागढ़ अभिलेख, सातवाहन नरेस गोतमी पुत्र शातकर्णी का नासिक गुहालेख, समुन्द्रगुप्त का प्रयाग स्तम्भ लेख, यशोवर्मन का मंदसोर अभिलेख, पुलकेशिन द्वितीय का ऐहोल अभिलेख स्कन्दगुप्त का भीतरी तथा विजयसेन का देवपाड़ा अभिलेख इत्यादी | शक शासक रुद्रदामन का जूनागढ़ अभिलेख संस्कृत में लिखा पहला अभिलेख हैं ( 150 ई.)
सिक्के
प्राचीन सिक्के सोना, चांदी, ताम्बा, कांसा, सीसा, और पोटीन के बनाये जाते थे |भारत में सिक्को पर केवल चिन्ह उत्कीर्ण जाते थे | ये आहत या पंचमाक़र्ड सिक्के कहलाते है सिक्को के अध्ययन को मुद्राशास्त्र कहते है पुरातात्विक स्रोतों के आधार पर अनुमान लगाया जाता है सर्वप्रथम हिन्द यूनानियो ने ही स्वर्ण मुद्राएँ जरी की थी | आहत सिक्को पर पेड़, मछली, हाथी, सांड, अर्द्धचंद्र की आकृतियाँ बनी होती थी | इन सिक्को की सबसे प्राचीन निधियां ( होडर्स ) पूर्वी उत्तर प्रदेश तथा मगध से प्राप्त होती हैं |

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